Bhauma Mangalavara Vrat
February 26, 2026 Thursday
Mangalavara Vrat
मङ्गलवार का व्रत भगवान हनुमान एवं मङ्गल देव को समर्पित होता है। इस व्रत को करने से सङ्कटमोचन हनुमान जी की कृपा से सभी सङ्कटों का निवारण हो जाता है। मङ्गलवार व्रत को भौमवार व्रत भी कहा जाता है। इस व्रत को करने से कुण्डली में मङ्गल जनित दोषों का शमन होता है तथा सकारात्मक परिणाम प्राप्त होते हैं।
धर्मग्रन्थों में मङ्गलवार व्रत के विभिन्न प्रकारों का वर्णन प्राप्त होता है। वीरमित्रोदय भौमवार व्रत छः भौमवार के लिये, भविष्यपुराणोक्त भौमव्रत एक वर्ष के लिये, पद्मपुराणोक्त भौमव्रत 21 भौमवार तक किया जाता है। इन सभी व्रतों के विधान एवं कथनों में प्रकारान्तर पाया जाता है।
भौम मङ्गलवार व्रत आहार विचार
वीरमित्रोदय भौमवार व्रत जो छः मङ्गलवार के लिये किया जाता है उसमें नक्त व्रत, अर्थात् रात्रि में एक बार भोजन करना चाहिये। इसके अतिरिक्त अन्य मङ्गलवार व्रत में एकभुक्त अर्थात् किसी भी समय एक बार फलाहार ग्रहण किया जाता है।
भौम मङ्गलवार व्रत सङ्क्षिप्त विधि
सर्वप्रथम अरुणोदय काल में अपामार्ग की दातुन तथा तिल एवं आँवले की पिठी से किसी नदी आदि में अथवा घर में स्नान करके स्वच्छ धुले हुये लाल वस्त्र धारण करें। लाल रंग का ही उपरना (पटका) धारण करें। तदुपरान्त ताम्र के पात्र में रक्तचन्दन, अक्षत, पुष्प, आदि अर्पित कर अग्निमूर्धा मन्त्र से 108 अर्घ्य प्रदान करें।
तत्पश्चात् घर आकार गोबर से भूमि लीपकर पत्नी, पुत्रादि सहित भगवान मङ्गल की पूजा-अर्चना करें। मास, पक्ष, तिथि आदि का उल्लेख करके व्रत करने का सङ्कल्प लेना चाहिये - "ऋण एवं व्याधि के नाश के लिये तथा पुत्र-पौत्र एवं धन-धान्य की प्राप्ति हेतु मैं मङ्गलवार का व्रत करूँगा। उसके अङ्गरूप में मङ्गल देवता का पूजन भी करूँगा।"
सङ्कल्प के उपरान्त श्री मङ्गल भगवान के यन्त्र का षोडशोपचार पूजन करें। पूजन सम्पन्न होने पर भौमवार व्रत कथा का पाठ अथवा श्रवण करें।
मङ्गल, भूमिपुत्र, ऋणहर्ता, धनप्रद, स्थिरासन, महाकार्य, सर्व कर्मावरोधक, लोहित, लोहिताक्ष, सामगानां कृपाकर, धरात्मज, कुज, भौम, भूतिद, भूमिनन्दन, अंगारक, यम, सर्व रोगापहारक, वृष्टिकर्ता, वृष्टि, अपहर्ता/सर्वकामफलप्रद, यह भगवान मङ्गल के 21 नाम हैं, व्रत में सन्ध्या के समय इनका जाप करने से उत्तम फल की प्राप्ति होती है।
भौम मङ्गलवार व्रत उद्यापन
मङ्गलवार का व्रत प्रकारान्तर के अनुसार 6 भौमवार, 21 भौमवार तथा 1 वर्ष तक किया जाता है। तदुपरान्त इस व्रत का विधिपूर्वक उद्यापन करना चाहिये। उद्यापन विधि में भी व्रत के अनुसार परिवर्तन प्राप्त होता है। श्रीपद्मपुराण में वर्णित उद्यापन विधि निम्नलिखित है -
आठ हाथ लम्बे मण्डप का निर्माण कीजिये। उसपर एक हाथ लम्बा स्थण्डिल का निर्माण कीजिये। उसके ऊपर चावलों से मङ्गल के भौम-मण्डल की रचना करें। उस मण्डल की चारों दिशाओं में चार दीपक रखें, उनके समक्ष 21 घट रखें। एक कलश के ऊपर स्वर्ण की प्रतिमा स्थापित करें उसे लाल वस्त्र उढ़ा दें। पवित्र पुष्प, दीप, धूप आदि से पूजन करें। अग्निमूर्धा मन्त्र से आहुति दें। खैर की समिध होनी चाहिये। 108 आहुति प्रदान करने के उपरान्त दिक्पालों की आहुति दें। मङ्गल देव का अङ्ग पूजन करके गन्धादि अर्पित करें।
ब्राह्मणों को भोजन कराकर वस्त्र, दक्षिणा आदि सहित कुम्भ प्रदान कर दें। तदुपरान्त आचार्य का पूजन करें तथा बछड़े वाली गाय तथा समस्त पूजन पीठ प्रदान कर दें। उनसे अच्छिद्र याचना करें, जिस पर वे सभी कहें - "आपका व्रत निर्दोष सम्पन्न हुआ।" निर्धन, कृपण तथा नेत्रहीनों को भोजन प्रदान करें। अन्त में मौन होकर स्वयं भी भोजन ग्रहण करें। इस प्रकार श्रीपद्मपुराण में वर्णित मङ्गल व्रत का उद्यापन सम्पन्न होता है।