Brihaspati Brihaspativara Vrat
February 26, 2026 Thursday
Brihaspativara Vrat of Lord Brihaspati
बृहस्पतिवार व्रत, सर्वाधिक प्रचलित सप्तवार व्रतों में से एक है। बृहस्पतिवार व्रत करने से जीवन में आने वाली अनेक प्रकार की समस्याओं का निवारण हो जाता है। अपनी-अपनी कुल परम्परा के अनुसार इस दिन भक्तगण भगवान बृहस्पति अथवा भगवान विष्णु की पूजा करते हैं। इसके अतिरिक्त इस दिन विष्णु जी के श्रीसत्यनारायण स्वरूप का पूजन तथा श्रीसत्यनारायण कथा का आयोजन करना भी अत्यन्त शुभ माना जाता है। स्त्रियों के लिये यह व्रत परम् कल्याणकारी कहा गया है।
जिस भी बृहस्पतिवार को अनुराधा नक्षत्र हो, उस दिन से बृहस्पति व्रत को ग्रहण करना चाहिये। भविष्यपुराण, व्रतराज तथा व्रत परिचय आदि धर्मग्रन्थों में इस व्रत का वर्णन प्राप्त होता है। बृहस्पतिवार व्रत में पीतरंग की वस्तुओं का प्रयोग करना उत्तम माना जाता है। व्रत न करने वाले जातक भी यदि इस दिन गाय को हल्दी एवं चने की दाल मिश्रित आटे की लोयी खिलाते हैं तो उन्हें सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
भगवान बृहस्पति की आराधना करने से विवाह में आ रही बाधाओं का अन्त होता है तथा सामाजिक मान-सम्मान की वृद्धि होती है। देवगुरु बृहस्पति अपने भक्तों को ज्ञान-विज्ञान, पद-प्रतिष्ठा तथा यश-कीर्ति प्रदान करते हैं। कुण्डली में बृहस्पति सम्बन्धी दोषों के शमन हेतु भी यह व्रत लाभकारी सिद्ध होता है।
बृहस्पति बृहस्पतिवार व्रत आहार विचार
बृहस्पतिवार के दिन एकभुक्त व्रत किया जाता है, अर्थात् इस दिन एक समय ही भोजन ग्रहण करना चाहिये। इस दिन फलाहर में पीतरंग के फलों का प्रयोग किया जाता है। व्रत में किसी भी प्रकार के नमक का सेवन नहीं करना चाहिये। इस दिन केले के वृक्ष, मूल, फल आदि का पूजन भी किया जाता है।
बृहस्पति बृहस्पतिवार व्रत सङ्क्षिप्त विधि
जिस समय बृहस्पतिवार का संयोग अनुराधा नक्षत्र से हो उस दिन सर्वप्रथम बृहस्पतिवार व्रत आरम्भ करना चाहिये। स्नानादि नित्य कर्मों से निवृत्त होकर व्रत का सङ्कल्प ग्रहण करें - "मैं अपने समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु तथा धन-धान्य, विद्या एवं ज्ञान आदि की प्राप्ति हेतु बृहस्पति व्रत करूँगा। इस व्रत के अङ्ग स्वरूप षोडशोपचार पूजन भी करूँगा।"
- स्वच्छ भूमि को गोबर से लीपकर उसपर चौक निर्माण करें।
- तदुपरान्त यदि सम्भव हो तो स्वर्ण के पात्र में स्वर्ण के भगवान बृहस्पति की स्थापना करें।
- पीत वस्त्र, पीत पुष्प, पीत नैवेद्य तथा अन्य आवश्यक पदार्थों सहित षोडशोपचार पूजन करें।
- बृहस्पतये नमः मन्त्र का यथाशक्ति जाप करें।
- पूजनोपरान्त बृहस्पतिवार व्रत कथा का पाठ अथवा श्रवण करें तथा बृहस्पति देव की आरती करें।
- गाय को हल्दी एवं चने की दाल मिश्रित आटे की लोयी एवं केला खिलायें।
- ब्राह्मण को पीतधान्य के खाद्य पदार्थ दक्षिणा एवं पीतवस्त्र सहित दान करें।
- अन्त में स्वयं भी फलाहार ग्रहण करें।
इस प्रकार बृहस्पतिवार व्रत की सङ्क्षिप्त एवं सरल विधि सम्पूर्ण होती है।
बृहस्पति बृहस्पतिवार व्रत उद्यापन
बृहस्पतिवार का व्रत विभिन्न मतानुसार भिन्न-भिन्न संख्याओं में किया जाता है। श्री व्रतराज के अनुसार, बृहस्पति व्रत सात माह तक करना चाहिये। एक अन्य प्रचलित विधि के अनुसार 16 बृहस्पतिवार तक व्रत रखा जाता है तथा 17वें बृहस्पतिवार व्रत को व्रत का उद्यापन किया जाता है तथा कुछ लोग इसे 7 बृहस्पतिवार तक करते हैं।
उद्यापन के दिन किसी पवित्र नदी आदि में स्नान एवं तर्पण कर पीत वस्त्र धारण करें। तदुपरान्त घर पर गोबर से लीप कर सुन्दर चौक की रचना करें। उस पर स्वर्ण के पात्र में स्वर्ण के ही भगवान बृहस्पति को विराजमान करें। उन्हें पीत रंग का उपवीत धारण करायें तथा पादुका, उपानह्, छत्र तथा कमण्डलु से अलङ्कृत करें। पीले पुष्प, चन्दन, कुमकुम, धूप, दीप, फल, तण्दुल, खण्ड, नैवेद्य, उपहार आदि अर्पित कर विधिवत् भगवान बृहस्पति का पूजन करें।
निम्नोक्त मन्त्र से बृहस्पति देव की प्रार्थना करें -
धर्मशस्त्रार्थतत्त्वज्ञ ज्ञानविज्ञानपराग। विविधार्तिहराचिन्त्य देवाचार्य नमोऽस्तुते॥
भावार्थ - "हे धर्मशास्त्र के तत्व के ज्ञाता!, हे ज्ञान एवं विज्ञान के पारदर्शक! हे देवताओं के कष्ट का निवारण करने वाले! हे अचिन्त्य! हे देवों के आचार्य! आपको नमस्कार है।"
प्रार्थना करने के उपरान्त, जो मन्त्रों का ज्ञाता हो उसे घृत एवं तिलों से हवन करना चाहिये। 108 अथवा 28 समिध होनी चाहिये। मधु-सर्पी सहित दधि अथवा घृत से हवन करना चाहिये। पिप्पल्य की समिध होनी चाहिये। हवनोपरान्त ब्राह्मणों को पीतधान्य अर्थात् चने के खाद्य पदार्थों का भोजन करवायें। सुवर्ण की दक्षिणा प्रदान करें। ब्राह्मण भोज के पश्चात् बन्धु-बान्धवों सहित स्वयं भोजन ग्रहण करें। इस प्रकार बृहस्पतिवार व्रत का उद्यापन सम्पूर्ण होता है।
यह व्रत सभी पापों को हरने वाला, कल्याणकारी तथा महापुण्यदायक है। यदि कुण्डली में बृहस्पति विषम स्थिति में हो तो इस प्रकार शान्ति करनी चाहिये। किसी-किसी स्थान पर उक्त उद्यापन विधि में नवग्रह विधान पद्धति से पाठभेद हो गया है।