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Chandra Somavara Vrat

February 26, 2026 Thursday

Chandra Somavara Vrat

सप्तवार में सोमवार को भगवान चन्द्र शासित करते हैं। अतः चन्द्रदेव को प्रसन्न करने हेतु चन्द्र सोमवार व्रत किया जाता है। भगवान चन्द्र हिन्दु धर्म के महत्वपूर्ण देवताओं में से एक हैं। भगवान चन्द्र को उनके भक्त सोम, रोहिणीनाथ, अत्रिपुत्र, अनुसूयानन्दन तथा चन्द्रदेव आदि नामों से भी पुकारते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार मानसिक समस्याओं से पीड़ित जातकों को चन्द्रोपासना अवश्य करनी चाहिये। श्रद्धापूर्वक चन्द्रदेव की पूजा एवं व्रत करने से आत्मबल में वृद्धि होती है तथा चन्द्रदोष से सम्बन्धित समस्याओं का निवारण होता है।

भगवान चन्द्र

वैदिक ज्योतिष में चन्द्रमा को स्त्री ग्रह के रूप में वर्णित किया गया है। राशिचक्र में चन्द्रदेव कर्क राशि को नियन्त्रित करते हैं। नक्षत्र मण्डल में रोहिणी, हस्त तथा श्रवण नक्षत्र के स्वामी भी चन्द्रदेव ही हैं। चन्द्रलोक में निवास करने वाले चन्द्रदेव को जल तत्व का अधिष्ठाता भी माना जाता है। ज्योतिषशास्त्र में चन्द्रमा को मन, स्वभाव, आर्थिक स्थिति, माता, आत्मबल, बायाँ नेत्र, वक्षस्थल तथा आकस्मिक दुर्घटनाओं का कारक ग्रह कहा गया है।

स्मरण शक्ति, हृदय, अनिद्रा, मानसिक तनाव, भावनात्मक असन्तुलन, सर्दी-जुखाम, मिर्गी, पागलपन तथा फेफड़ों सम्बन्धी रोगों के निवारण हेतु चन्द्र सोमवार व्रत करने का सुझाव दिया जाता है। सामान्यतः चन्द्र सोमवार व्रत 11, 21, 31 सोमवार के लिये किया जाता है, किन्तु अनेक भक्त अपनी श्रद्धा एवं क्षेत्रीय मान्यताओं के अनुसार 10 एवं 54 सोमवार व्रत करने के उपरान्त उद्यापन करते हैं।

चन्द्र सोमवार व्रत आहार विचार

चन्द्र सोमवार का व्रत सामान्यतः दिवस के तृतीय प्रहर तक किया जाता है। किन्तु व्रत के प्रकार के अनुसार आहार एवं अन्य नियमों में भिन्नता हो सकती है। अतः चन्द्र सोमवार व्रत में सूर्यास्त के उपरान्त चन्द्रदेव को अर्घ्य अर्पित करके ही व्रत का पारण करना चाहिये। चन्द्र सोमवार व्रत में अन्न, चावल, तथा नमक का सेवन पूर्णतः वर्जित माना गया है।

चन्द्र सोमवार व्रत सङ्क्षिप्त विधि

सर्वप्रथम चन्द्र सोमवार व्रत ग्रहण करने हेतु व्रती को चैत्र, वैशाख, श्रावण, कार्तिक अथवा मार्गशीर्ष मास के प्रथम सोमवार को व्रत आरम्भ करना चाहिये। प्रातः किसी पवित्र नदी में स्नान एवं तर्पण कर श्वेत वस्त्र धारण करें। तदुपरान्त तिथि, माह, पक्ष, स्थान, गोत्र आदि का उच्चारण कर व्रत का सङ्कल्प ग्रहण करें - "मैं अपने एवं अपने समस्त कुटुम्ब की कुशलता, स्वास्थ्य, दीर्घायु, आरोग्य तथा ऐश्वर्य की वृद्धि हेतु 11, 21 अथवा 31 सोमवार तक सोमव्रत व्रत का पालन करूँगा तथा उसके अङ्ग रूप से सोलह उपचारों सहित भगवान चन्द्र का षोडशोपचार पूजन करूँगा।"

  • सङ्कल्प ग्रहण करने के उपरान्त घर के पूजन स्थल में गोबर से लीपकर चौक पूरें।
  • तदुपरान्त उस स्थान पर एक लकड़ी की चौकी स्थापित कर उस पर श्वेत वस्त्र बिछायें।
  • उस पर चन्द्रदेव की रजत निर्मित प्रतिमा अथवा यन्त्र की स्थापना करें।
  • यथाशक्ति ॐ सों सोमाय नमः। मन्त्र का जाप करें।
  • अब चन्द्रदेव का ध्यान करते हुये उन्हें मालती, चम्पा, चम्पक, कुन्द, मन्दार, पुन्नाग, शत पत्र, दिव्यश्वेत पद्म आदि श्वेत पुष्प अर्पित करें।
  • तत्पश्चात् आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, गन्ध, उपवीत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, प्रदक्षिणा, नमस्कार तथा पुष्पाञ्जलि आदि द्वारा भगवान चन्द्र का षोडशोपचार पूजन करें।
  • पूजनोपरान्त चन्द्र सोमवार व्रत कथा का पाठ अथवा श्रवण करें।
  • सायाह्नकाल जल में मिश्री, अक्षत् तथा सम्भव हो तो कच्चा दुग्ध मिश्रित कर चन्द्रदेव को अर्घ्य अर्पित करके व्रत का पारण करें।

इस प्रकार चन्द्र सोमवार व्रत की सङ्क्षिप्त एवं सरल विधि सम्पूर्ण होती है।

चन्द्र सोमवार व्रत उद्यापन

उद्यापन किसी भी व्रत का अत्यन्त महत्वपूर्ण अङ्ग होता है। व्रत का सङ्कल्प लेते समय निर्धारित की गयी सङ्ख्या पूर्ण होने पर व्रत का उद्यापन किया जाता है। चन्द्र सोमवार व्रत का उद्यापन करना चाहिये। सोमवार व्रत के विभिन्न प्रकारों के आधार पर उद्यापन की विधि भी भिन्न-भिन्न है, यहाँ सामान्य उद्यापन विधि वर्णित की जा रही है।

चन्द्र सोमवार व्रत का उद्यापन करने हेतु आचार्य एवं ब्राह्मणों को निमन्त्रित करें। भगवान का ही स्वरूप मानकर आचार्य एवं ब्राह्मणों का श्वेत चन्दन एवं श्वेत पुष्पों से पूजन करें तथा उनसे आज्ञा लेकर उद्यापन आरम्भ करें।

सर्वप्रथम अपने सामर्थ्य के अनुसार रजत निर्मित भगवान चन्द्र की मूर्ति लें। एक स्वर्ण, रजत, ताम्र अथवा मिट्टी के कुम्भ की कलश स्थापना करके उस पर चन्द्रदेव को विराजमान करें। तदुपरान्त आचार्य के निर्देशानुसार पूर्ण भक्ति भाव से चन्द्रदेव का पूजन करें। पूजनोपरान्त चन्द्रदेव के बीज मन्त्र ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्राय नमः। से 108 आहुति का हवन करें। पलाश की समिध तथा ओदन अर्थात् दुग्ध एवं पके हुये चावल तथा घृत की आहुतियाँ होनी चाहिये।

पूर्णाहुति के उपरान्त सपत्नीक गुरुदेव का पूजन करें। कलश सहित चन्द्रदेव की प्रतिमा आचार्य को दान कर दें। तत्पश्चात् खीर एवं खाण्ड सहित ब्राह्मणों को भोजन करायें। उन्हें रजत निर्मित कुण्डलादि धारण करायें, श्वेत वस्त्र एवं उपवीत अर्पित करें, श्वेत चन्दन का लेप करें तथा यथाशक्ति दक्षिणा प्रदान करें।

सोमवार व्रत का उद्यापन करते हुये उत्तम फलों की प्राप्ति हेतु यथाशक्ति चन्द्र से सम्बन्धित दान करना चाहिये। सामर्थ्य के अनुसार चावल, मिश्री, दुग्ध, दही, कर्पूर, मोती, रजत, श्वेत चन्दन, श्वेत वस्त्र तथा श्वेत बैल का दान करना चाहिये। दान आदि करने के उपरान्त ब्राह्मणों को विदा एवं पूजन विसर्जन करें।

अन्ततः अपने बन्धु-बान्धवों एवं कुटुम्बीजनों सहित स्वयं मौन होकर भोजन ग्रहण करें। इस प्रकार जो इस चन्द्र सोमवार व्रत को सम्पन्न कर विधिवत् उद्यापन करता है, उसके सभी मनोरथ सिद्ध होते हैं तथा मानसिक समस्याओं का निवारण होता है। चन्द्रदेव की कृपा से व्यक्ति की समस्त पीड़ाओं का शमन होता है तथा वह सुख-सम्पन्न जीवन व्यतीत कर अन्त में चन्द्रलोक को प्राप्त होता है। इस प्रकार चन्द्र सोमवार व्रत का उद्यापन सम्पूर्ण होता है।